MURSHID | YE ZAALIM SAMAAJ HAM SE KHEL BURA KHEL GAYA Life Shayari



 मुर्शिद ,

ये ज़ालिम समाज हम से खेल बुरा खेल गया,

हाय मुरशिद…. 

औऱ हम देखते रह गए एक बेजुबान बच्चे की तरह ….




नज़र नज़र से मिलना बहुत ज़ुरूरी था,

हमारा होश में आना ज़ुरूरी था,

बदन में खून की गर्दिश बहुत ही मध्यम थी,

उसे गले से लगाना बहुत ही ज़ुरूरी था….




तुमने तो रिहा कर दिया था खुद हमें लेकिन,

हम साथ लिए फिरते है जंजीर तुम्हारी ।



हम फसाने नहीं एहसास लिखते हैं,,

मामूली_लहजों में कुछ खास लिखते हैं।



मोहब्बत का शायर हूँ,

सियासत पे नहीं लिखता,

दिलो में रंज है फिर भी

बगावत पे नहीं लिखता।



शिद्दत से इंतजार है उस सवाल का,

जिसके जवाब में हम दोनों कहें क़ुबूल है।।।



थामना कोई भी नहीं गिरती दीवार चाहता है,

बनना हर शख्स कबीले का सरदार चाहता है..




हमारा तो बहुत ही नुकसान हो गया,

वो किसी औऱ की जान हो गया है,

हम माँग रहे थे उसको खुदा से औऱ 

खुदा किसी औऱ पर मेहरबान हो गया है…





गर्दिश तो चाहती है,तबाही  मेरी मगर..

मजबूर है किसी की दुआओं के सामने ।





कभी देख लो तुम भी 
मुझे प्यार से
हर बार मैं ही पुकारूं
ये तय तो नही हुआ था।।




किताब मुहब्बत की मुझे पढ़ा गई वो लड़की,
जाते जाते मुझ को शायर बना गई वो लड़की,

मुझ को मालूम नहीं था दर्दे-मुहब्बत क्या है,
बिछड़ कर ये मज़ा भी चखा गई वो लड़की,

यार  कुछ  भी  नहीं रखा मुहब्बत में
जाते वक़्त ये समझा गई वो लड़की,

मुर्शिद कर के दो चार हिज्र की बातें
चराग़-ए-दिल  बुझा  गई वो लड़की,

न रही बाक़ी इश्क़ की  कोई निशानी
आग हर शय को लगा गई वो लड़की।




हम दोनो की मोहब्बत में महज़ इतना ही फ़र्क है,
एक तरफ़ ‘ था ‘ और दूसरी तरफ़ आज भी ‘ है ‘।



हो जाते हैं यारों वीरां शहर के शहर मुहब्बत में,
न जाने कहाँ से आते हैं इतने कहर मुहब्बत में,
लाजे-मुहब्बत हमनें  बचाली  वर्ना,
कुछ  मक्कार  घोल  गए थे  ज़हर  मुहब्बत में।



काश कोई ऐसी भी हवा चले 
कौन किसका हमको भी पता चले…





बड़े हो चुके होने का एहसास दिला के
जिंदगी झिंझोड़ देती है…
बचपन तब ही ख़त्म हो जाता है
जब माँ डाँटना छोड़ देती है…




वो शक्श तरसेगा मुझसे बात करने को,
जिसने अपने लहजे से मेरा दिल दुखाया है..





कैसे सीने से लगाऊ,किसी और के हो तुम,

मेरे होते तो बताता,मोहब्बत किसे कहते हैं।



मेरे भीतर बस प्रेम बसता है….
तुम बसना चाहो,  तो
क्यों न तुम प्रेम ही बन जाओ….!



बना कर छोड़ देते हैं अपने वजूद का आदी…

कुछ लोग ऐसे भी सिला देते हैं मोहब्बत का…





कभी  बेवजह  तवज्जो
कभी  बेइंतिहा  बेरुखी

तुम  आज़मा  रहे  हो
मुझको  रुख  बदल- बदल  कर।





मेरे हक़ में हैं तुझे चाहना,
तू चाहे या ना चाहे ये तेरी मर्जी हैं।
मेरे हक़ में हैं तुझे याद करना,
तू करे या ना करे ये तेरा फैसला हैं।





मुहोब्बत ?? 
हा करती हूँ मैं तुमसे मुहोब्बत।
कितनी ??
मुहोब्बत तोली नही जाती ना।
कब तक??
कायनात कब खत्म होगी पता हैं ?
जुदाई?
ये हक़ तो मैंने खुदको दिया ही नही।





बिन तुम्हारे मेरी हर ,
खुशी अधूरी है…
फिर सोचो मेरे लिए ,
तू कितनी जरूरी है…!!

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